निवारक स्वास्थ्य देखभाल और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना आवश्यक: डॉ. जितेंद्र सिंह
स्वास्थ्य एवं कल्याण शिखर सम्मेलन 2026 में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्वस्थ रहने का अर्थ केवल बीमारियों का न होना नहीं है, बल्कि समग्र शारीरिक और मानसिक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने 'स्वास्थ्य एवं कल्याण शिखर सम्मेलन 2026' में स्वास्थ्य के प्रति बदलते दृष्टिकोण पर चर्चा की। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्वस्थ रहना केवल रोगमुक्त होना नहीं है, बल्कि अब ध्यान निवारक स्वास्थ्य देखभाल (preventive healthcare) और शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित होना चाहिए।
डॉ. सिंह ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत ने स्वास्थ्य की व्यापक समझ विकसित की है, जिसमें आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद, योग और कल्याण केंद्रों को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने में एक स्वस्थ युवा पीढ़ी की केंद्रीय भूमिका होगी। उनके अनुसार, स्वास्थ्य में अब शारीरिक और मानसिक तंदुरुस्ती के साथ-साथ कार्य-जीवन संतुलन और रहने के वातावरण जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है।
भारत में बदलती स्वास्थ्य चुनौतियों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के समय औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 45 वर्ष थी, जिसमें अब उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, इस वृद्धि के साथ बीमारियों का स्वरूप भी बदला है। हृदय रोग, टाइप 2 मधुमेह और अन्य जीवनशैली से संबंधित गैर-संक्रामक रोग अब अधिक प्रमुख हो गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य सेवाओं का अगला चरण केवल उपचार पर निर्भर रहने के बजाय रोकथाम और शीघ्र निदान पर आधारित होना चाहिए।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आयुष्मान भारत जैसी पहलों और चिकित्सा शिक्षा के विस्तार का उल्लेख किया, जो स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने और परिवारों पर वित्तीय बोझ कम करने के प्रयास हैं। उन्होंने किफायती और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करने में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे भारतीय प्रयोगशालाओं ने कोविड-19 के दौरान SARS-CoV-2 जीनोम का तेजी से अनुक्रमण कर स्वदेशी टीकों के विकास में योगदान दिया।
मंत्री ने कहा कि अब वैज्ञानिक अनुसंधान को ऐसे उत्पादों में बदलना आवश्यक है जिनसे आम जनता को लाभ मिले। ट्रांसलेशनल रिसर्च के माध्यम से किफायती निदान, बायो सेंसर और दवा वितरण प्रौद्योगिकियां विकसित की जा सकती हैं। इसके अलावा, उन्होंने नवजात शिशुओं और गर्भवती महिलाओं में आनुवंशिक विकारों की प्रारंभिक जांच के लिए 'उम्मीद' जैसे कार्यक्रमों की सराहना की।
अंत में, डॉ. सिंह ने आह्वान किया कि चिकित्सा पेशेवरों, शोधकर्ताओं और उद्योग जगत के बीच निरंतर सहयोग होना चाहिए ताकि एक स्वस्थ भारत का निर्माण किया जा सके, जो विकसित भारत 2047 की यात्रा का अभिन्न अंग हो।



