केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III' योजना को दी मंजूरी; 1.86 लाख करोड़ रुपये से होगा विकास
प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने GEC-III योजना को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम को मजबूत करना और 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज स्थापित करना है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III' (GEC-III) योजना को अपनी मंजूरी दे दी है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य भारत के इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) को सशक्त बनाना है, जिससे विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच 135 गीगावाट (GW) तक की नवीकरणीय ऊर्जा का परिवहन संभव हो सकेगा।
इस योजना के तहत ग्रिड की फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाने और बिजली आपूर्ति में आने वाली बाधाओं, जैसे कंजेशन और पीक-आवर की कटौती से निपटने के लिए 50 GWh के बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की स्थापना का प्रावधान है। यह स्टोरेज सिस्टम नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों के स्तर पर या अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर लगाए जाएंगे, ताकि सौर ऊर्जा की अनुपलब्धता के समय भी मांग को पूरा किया जा सके।
परियोजना के वित्तीय विवरण के अनुसार, इस पूरी योजना की कुल लागत 1,86,405 करोड़ रुपये है, जिसे वित्तीय वर्ष 2032-33 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें से 1,36,378 करोड़ रुपये इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के विकास के लिए और 50,000 करोड़ रुपये बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के लिए आवंटित किए गए हैं। सरकार इस परियोजना के लिए 54,082 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) प्रदान करेगी, जिससे ट्रांसमिशन शुल्क कम होगा और बिजली की लागत नियंत्रित रहेगी।
कार्यान्वयन रणनीति की बात करें तो, InSTS के अंतर्गत सभी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) के माध्यम से लागू किया जाएगा। वहीं, ब्राउनफील्ड अपग्रेडेशन और नेटवर्क सुदृढ़ीकरण के कार्य कॉस्ट प्लस बेसिस (CPB) के तहत किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में स्टेट ट्रांसमिशन यूटिलिटीज कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करेंगी और ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स (TSP), बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेनटेन (BOOM) मॉडल के तहत भाग लेंगे।
यह योजना भारत के 2035 तक 900 गीगावाट गैर-जीवाश्म (नॉन-फॉसिल) क्षमता स्थापित करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगी। इसके अतिरिक्त, इससे ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी, कार्बन फुटप्रिंट कम होगा और विनिर्माण, निर्माण व ऊर्जा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। विशेष रूप से घरेलू ऊर्जा भंडारण उद्योग और ग्रिड प्रबंधन के क्षेत्र में कुशल रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे।

