वेस्टवॉटर मैनेजमेंट: अब अपशिष्ट जल बनेगा संसाधन, स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन के तहत शहरों में नया दृष्टिकोण
स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन के जरिए इस्तेमाल किए गए पानी को उपचारित कर उसे संसाधन में बदला जा रहा है, जिससे जल संरक्षण और सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा मिल रहा है।

तेजी से बढ़ते शहरों में जल प्रबंधन के लिए अब एक नया दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है, जिसके तहत घरों और कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट जल (वेस्टवॉटर) को बेकार मानने के बजाय एक मूल्यवान संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। 'स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन' (SBM-U) के अंतर्गत 'यूज़्ड वॉटर मैनेजमेंट' (UWM) पर विशेष बल दिया जा रहा है, ताकि अनुपचारित सीवेज को जल स्रोतों में जाने से रोका जा सके और उपचारित पानी का सुरक्षित पुन: उपयोग किया जा सके।
इस अभियान में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। सरकार ने 'वॉटर प्लस' सर्टिफिकेशन के माध्यम से शहरों के लिए दिशानिर्देश तय किए हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो कि अपशिष्ट पानी का उपचार निर्धारित मानकों के अनुसार हो। इसके साथ ही 'ओपन डेफिकेशन फ्री' (ODF) ++ प्रोटोकॉल के जरिए मल के कीचड़ और सेप्टेज के सुरक्षित प्रबंधन का आकलन किया जा रहा है। एसबीएम 2.0 के तहत छोटे शहरों में एसटीपी लगाने के लिए 11,785 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे उपचार क्षमता में 4,900 मिलियन लीटर प्रति दिन (MLD) की वृद्धि होगी।
देश के विभिन्न शहरों ने वेस्टवॉटर प्रबंधन के सफल मॉडल पेश किए हैं:
जयपुर: यहां देहलावास एसटीपी की क्षमता 215 एमएलडी है, जो राजस्थान में सबसे अधिक है। यह प्लांट एससीएडीए (SCADA) सिस्टम से स्वचालित है और सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर (SBR) तकनीक का उपयोग करता है। उपचारित पानी का उपयोग सिंचाई और औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जा रहा है, जबकि कुछ हिस्सा द्रव्यवती नदी में छोड़ा जाता है।
इंदौर: 'वॉटर+' सर्टिफ़िकेशन पाने वाला पहला शहर बनने वाला इंदौर अब उपचारित किए बिना गंदा पानी नदियों या नालों में नहीं बहाता। शहर में केंद्रीकृत और विकेंद्रीकृत एसटीपी के साथ 200 किलोमीटर से अधिक का पाइप नेटवर्क बिछाया गया है। साथ ही, 2022 में चार महीनों के भीतर 1.25 लाख से अधिक वर्षा जल संचयन इकाइयां स्थापित की गईं।
सूरत: सूरत नगर निगम ने 116 एमएलडी क्षमता के चार टर्शियरी ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए हैं। उपचारित पानी का उपयोग औद्योगिक कार्यों, झीलों के कायाकल्प और खेती के लिए किया जा रहा है। सीवरेज सिस्टम के रखरखाव के लिए यहां अत्याधुनिक रोबोटिक मशीनों का उपयोग किया जाता है।
नवी मुंबई: महाराष्ट्र के इस एकमात्र फाइव-स्टार रेटिंग और 'वॉटर+' प्रमाणित शहर ने अपनी सीवेज तकनीक को 30 लाख की जनसंख्या के अनुसार अपग्रेड किया है। यहां उपचारित पानी का 30% से अधिक हिस्सा बगीचों, ठोस कचरा वाहनों और ट्रांसपोर्ट बसों की धुलाई में इस्तेमाल होता है।
तिरुपति: तिरुपति ने एक आत्मनिर्भर राजस्व मॉडल विकसित किया है। यहां 50 एमएलडी क्षमता का एसटीपी है, जिसमें से 5 एमएलडी उपचारित पानी श्रीकालाहस्ती पाइप्स लिमिटेड को बेचा जाता है, जिससे प्रति माह 6 लाख रुपये की नेट कमाई होती है। वहीं, 18 एमएलडी पानी किसानों को मुफ्त दिया जाता है।
इन प्रयासों से शहरी जल प्रबंधन अब केवल प्रदूषण रोकने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सिंचाई, बागवानी और उद्योग के लिए पानी उपलब्ध कराने वाले एक चक्रीय तंत्र (सर्कुलर सिस्टम) में बदल रहा है।


