आर्थिक लचीलेपन के लिए सामाजिक समावेशन जरूरी: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन
नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में उपराष्ट्रपति ने समावेशी आर्थिक नीतियों और लोकतंत्र व विकास के सह-अस्तित्व पर जोर दिया।

उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने नई दिल्ली में आयोजित पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में उद्घाटन भाषण दिया। यह सम्मेलन ‘फ्लक्स के युग में लचीलापन’ (Resilience in an Age of Flux) विषय पर आधारित था। इस अवसर पर उन्होंने नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और व्यापार जगत के नेताओं को संबोधित करते हुए तेजी से बदलते वैश्विक परिवेश में लचीली और समावेशी आर्थिक नीतियों की आवश्यकता पर बल दिया।
उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि आर्थिक लचीलेपन को सामाजिक लचीलेपन से अलग नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सच्चा लचीलापन इसी बात में निहित है कि कोई भी नागरिक, उद्यम या क्षेत्र विकास की प्रक्रिया में पीछे न छूटे। श्री राधाकृष्णन ने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र और विकास एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि एक लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर हासिल की गई समावेशी प्रगति और आम सहमति निर्माण ने आर्थिक सुधारों को अधिक स्थिरता प्रदान की है, जो 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है।
वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता पर चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने जेएएम (JAM) ट्रिनिटी, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और जीएसटी (GST) की भूमिका को परिवर्तनकारी बताया। उन्होंने आंकड़े साझा करते हुए कहा कि अगस्त 2026 तक 590 मिलियन से अधिक जन धन खाते खोले जा चुके हैं। साथ ही, जीएसटी पंजीकरण जो 2017 में लगभग 6.65 मिलियन था, मई 2026 तक बढ़कर 16.5 मिलियन हो गया है।
महिला सशक्तिकरण के विषय पर उन्होंने कहा कि भारत अब महिला सशक्तिकरण से 'महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास' की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने 9.2 मिलियन स्वयं सहायता समूहों के योगदान और 34.6 मिलियन से अधिक 'लखपति दीदियों' के उद्भव का उल्लेख किया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि जब गांव की एक महिला का बैंक खाता होता है और वह औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़कर अपने समूह को उद्यम में बदलती है, तब वास्तविक लचीलापन निर्मित होता है।
श्री राधाकृष्णन ने यह ऐतिहासिक उपलब्धि भी साझा की कि 250 मिलियन से अधिक भारतीय अत्यधिक गरीबी से बाहर निकल चुके हैं। उन्होंने अनुसंधान और संस्थागत साझेदारी के महत्व पर जोर देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (IEG) के बीच सहयोग का स्वागत किया।
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कहा कि भारत का लचीलापन परिवर्तन का विरोध करने में नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास और सामूहिक प्रयास के साथ अपनाने में है। इस अवसर पर आईईजी के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के अध्यक्ष श्री एन. के. सिंह और बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन डॉ. माइकल देबब्रता पात्रा सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।


