राष्ट्रीय फेलोशिप से बदली डॉ. अनिक साहा की जिंदगी, आर्थिक तंगी को मात देकर बने रिसर्च असिस्टेंट
अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय फेलोशिप की मदद से डॉ. अनिक साहा ने अपनी पीएच.डी. पूरी की और शोध के क्षेत्र में करियर बनाया।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, समय पर मिली फेलोशिप सहायता वंचित समुदायों के शोधार्थियों के लिए मददगार साबित हो रही है। इसी कड़ी में अनुसूचित जाति समुदाय की सुनरी जाति से आने वाले 33 वर्षीय डॉ. अनिक साहा ने राष्ट्रीय फेलोशिप के माध्यम से अपनी गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना किया और शैक्षणिक सफलता हासिल की।
डॉ. साहा के जीवन में वह कठिन दौर तब आया जब उनके पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब हो गई। सीमित संसाधनों के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई और फीस का खर्च वहन करने के लिए शाम के समय निजी ट्यूशन पढ़ाना पड़ा। आर्थिक अभाव के कारण पीएच.डी. पूरी करना उनके लिए लगभग असंभव लग रहा था, लेकिन उन्होंने उच्च शिक्षा के प्रति अपना संकल्प बनाए रखा।
वर्ष 2018 से 2022 के बीच उन्हें एनएफएससी (NFSC) फेलोशिप के तहत एम.फिल. और पीएच.डी. के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई। इस सहायता राशि में प्रवेश शुल्क, शैक्षणिक शुल्क, फील्डवर्क का खर्च और शोध-प्रबंध (थीसिस) की छपाई व जमा करने का शुल्क शामिल था। यह फेलोशिप राशि नेट-जेआरएफ (NET-JRF) शोधार्थियों के लिए निर्धारित दरों के समान थी। इस वित्तीय सहायता ने डॉ. साहा के ऊपर से आर्थिक बोझ कम किया, जिससे वे पूरी तरह अपने शोध पर ध्यान केंद्रित कर सके।
कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ डॉ. अनिक साहा ने अपनी पीएच.डी. सफलतापूर्वक पूरी की। वर्तमान में वे पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले के आसनसोल स्थित काजी नजरुल विश्वविद्यालय में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) की एक परियोजना में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में कार्यरत हैं। उनकी यह यात्रा दर्शाती है कि लक्षित फेलोशिप सहायता किस तरह शोधार्थियों को आर्थिक बाधाओं से उबरने और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने में सक्षम बनाती है।


