स्वच्छता अभियान में महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय की बढ़ती भागीदारी से बदल रहा है सामाजिक परिदृश्य
देश के विभिन्न शहरों में महिलाएँ और ट्रांसजेंडर समुदाय स्वच्छता सेवाओं को पेशेवर पहचान और रोज़गार के अवसर में बदल रहे हैं, जिससे कचरा प्रबंधन को नया रूप मिल रहा है।

भारत में स्वच्छता अब केवल एक सरकारी सेवा न रहकर सम्मान, उद्यम और भागीदारी का जरिया बन गई है। 'स्वच्छता ही सेवा 2026' अभियान, जिसकी शुरुआत 17 सितंबर 2026 को 'स्वच्छता में सहभाग, स्वच्छ भारत, विकसित भारत' थीम के साथ की गई, इस दिशा में एक राष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है। इस अभियान के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय ने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में नेतृत्व संभालकर सामाजिक और आर्थिक बदलाव की नई कहानियाँ लिखी हैं।
उत्तर प्रदेश के लोनी की कृष्णा विहार कॉलोनी में महिलाओं ने गाय के गोबर जैसी चुनौती को अवसर में बदला है। यहाँ महिलाओं का एक समूह गोबर से अगरबत्ती और लोबान कप बना रहा है, जिससे गर्मियों के दौरान 40-50 महिलाओं को रोज़गार मिलता है। लोनी नगर पालिका परिषद इस पहल के माध्यम से उत्पादों की बिक्री से 25 प्रतिशत तक कमाई करती है। ये उत्पाद दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात और हैदराबाद सहित कई शहरों में सप्लाई किए जाते हैं और कोविड के दौरान इनके ऑर्डर मॉरिशस और दक्षिण अफ्रीका तक पहुंचे। अब गोबर से ईंधन वाली लकड़ी और खाद बनने वाले गमले बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है।
बिहार के पटना में 'पिंक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी' (MRF) का संचालन मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। यह सुविधा प्रतिदिन 2 टन सूखा और 1.5 टन गीला कचरा प्रबंधित करती है। पटना नगर निगम (PMC) के सहयोग से शुरू हुई इस पहल में 'कैश फॉर वेस्ट' मॉडल अपनाया गया है, जिसमें नागरिकों को सूखा कचरा देने पर भुगतान किया जाता है। इसके अलावा, पुरानी बेकार गाड़ियों को 'मोबाइल पिंक टॉयलेट' में बदलकर रिड्यूस, रियूज़ और रीसायकल (3R) के सिद्धांत को लागू किया गया है।
अन्य राज्यों में भी इसी तरह के सामुदायिक प्रयास देखे गए हैं। भोपाल में 250 महिला ब्रांड एंबेसडर ने 25 वार्डों में 'बर्तन बैंक' शुरू किए हैं ताकि सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग कम हो सके, जबकि 60 सदस्यों वाले 'स्वच्छता किटी ग्रुप' ने सामुदायिक सफाई के लिए साझा फंड बनाया है। उत्तराखंड में 'बैनी सेना' (बहनों की सेना) के तहत 570 महिलाएँ वार्डों में सफाई गतिविधियों की निगरानी और जागरूकता का कार्य कर रही हैं। वहीं शिलांग में 'इन्नेहस्खेम सेल्फ-हेल्प ग्रुप' की महिलाएँ गीले कचरे से खाद बनाकर अपनी आजीविका चला रही हैं।
समावेशिता के क्षेत्र में ओडिशा ने एक मिसाल कायम की है, जहाँ ट्रांसजेंडर समुदाय को शहरी स्वच्छता व्यवस्था के केंद्र में लाया गया है। कटक और भुवनेश्वर में ट्रांसजेंडर स्वयं सहायता समूहों को सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के संचालन और रखरखाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। भुवनेश्वर में 'स्वीकृति' नामक समूह 75-केएलडी वाले फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (FSTP) की देखभाल कर रहा है। इसके अलावा, भुवनेश्वर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने सात सेसपूल वाहनों के संचालन में भी ट्रांसजेंडर समूहों को शामिल किया है, जहाँ ड्राइवरों और हेल्पर्स को न्यूनतम लागू मजदूरी और आवश्यक सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जा रहा है।


