UPSC के शताब्दी समारोह में पीएम मोदी का संबोधन: विकसित भारत के लिए 'Nation First' और 'Citizen First' पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने UPSC के 100 वर्ष पूरे होने पर सिविल सेवाओं में बदलाव की आवश्यकता बताई और चयन प्रक्रिया में 'राष्ट्र प्रथम' और 'नागरिक प्रथम' के सिद्धांतों को अपनाने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय लोक सेवा आयोग (UPSC) के शताब्दी समारोह में भाग लिया और इस अवसर पर सिविल सेवाओं की भविष्य की दिशा और कार्य-संस्कृति को लेकर अपना दृष्टिकोण साझा किया। प्रधानमंत्री ने UPSC की 100 वर्षों की यात्रा को एक विरासत का उत्सव बताया और कहा कि समय के साथ तकनीक, सिलेबस और सरकारें बदलीं, लेकिन इस संस्था पर जनता का भरोसा अटूट रहा है। इस ऐतिहासिक अवसर पर एक स्मारक डाक टिकट, सिक्का और 100 महत्वपूर्ण केस लॉ का संकलन भी जारी किया गया।
संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने आजाद भारत के पुनर्निर्माण के लिए जिस 'स्टील फ्रेम' की आवश्यकता थी, वह प्रदान किया और इस संस्था को सशक्त बनाया। उन्होंने उल्लेख किया कि 1926 में नींव रखे जाने के समय प्राथमिकताएं अलग थीं, लेकिन आजादी के बाद का ध्यान भारत की अपनी व्यवस्था और सपनों पर केंद्रित रहा।
विकसित भारत के लक्ष्य पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि 2047 का भारत अधिक शहरी होगा और युवाओं की आकांक्षाएं बढ़ी होंगी। उन्होंने जोर दिया कि अब केवल सर्विस डिलीवरी पर्याप्त नहीं है, बल्कि पब्लिक सर्विसेज को 'इंस्टेंट डिलीवरी' वाली दुनिया की गति के साथ तालमेल बिठाना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि चयन प्रक्रिया में केवल ज्ञान की परीक्षा न हो, बल्कि यह भी देखा जाए कि युवा सिविल सेवा में क्यों आना चाहता है। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों को अपने मूल उद्देश्य को लिखकर रखने की सलाह दी ताकि वह उनके लिए एक सेल्फ-अप्रेजल टूल बन सके।
प्रधानमंत्री ने 'नागरिक देवो भव' का मंत्र देते हुए एक नई कार्य-संस्कृति का प्रस्ताव रखा, जिसके तीन मूल सिद्धांत हैं: प्रो-पीपल (Pro-People), प्रो-एक्टिव (Pro-Active) और गुड गवर्नेंस (Good Governance)। उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो गरीब की तकलीफ समझने की संवेदना रखने वाले और इनोवेटिव तरीके से समस्याओं का समाधान निकालने वाले प्रोफेशनल्स को चुने।
आने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने AI, डीपफेक, एल्गोरिद्मिक बायस और क्लाइमेट जस्टिस जैसे जटिल मुद्दों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए चयन प्रक्रिया में 'कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम सॉल्विंग' और दूरदृष्टि को परखने को प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने परीक्षा चक्र (Examination Cycle) को छोटा करने और 'टाइम सर्टेंटी' के सिद्धांत को अपनाने पर जोर दिया ताकि युवाओं पर आर्थिक बोझ कम हो सके।
प्रधानमंत्री ने UPSC और राज्य चयन आयोगों के बीच 'क्रॉस लर्निंग' और अंतरराष्ट्रीय बेस्ट प्रैक्टिसेज को अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने मिशन कर्मयोगी के i-GOT प्लेटफॉर्म के उपयोग से क्षमता निर्माण (Capacity Building) की बात कही। अंत में, उन्होंने समावेशिता के आंकड़े साझा करते हुए बताया कि 1952 में महिला उम्मीदवारों की संख्या 3 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 30 प्रतिशत से अधिक हो गई है। उन्होंने यह भी बताया कि 1976 की तुलना में परीक्षा देने वालों की संख्या में 45 गुना वृद्धि हुई है, जो देश के विशाल टैलेंट पूल को दर्शाता है।

