शिक्षा तभी सार्थक जब समाज को मिले लाभ: महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने वड़ोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के 75वें वार्षिक दीक्षांत समारोह को संबोधित किया और शिक्षा को राष्ट्र हित से जोड़ने पर जोर दिया।
भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने 23 सितंबर, 2026 को गुजरात के वड़ोदरा स्थित महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के 75वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में शिरकत की। इस अवसर पर विद्यार्थियों और शिक्षाविदों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा तभी सार्थक होती है जब उससे देश और समाज को वास्तविक लाभ पहुंचे।
राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय की 75 वर्षों की यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्थान ज्ञान की विभिन्न धाराओं को एक साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने वर्तमान समय की चुनौतियों का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समस्या का समाधान अब केवल अध्ययन की एक धारा तक सीमित नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि आज की महत्वपूर्ण समस्याओं के समाधान के लिए एक बहुविषयक दृष्टिकोण (Multidisciplinary Approach) की आवश्यकता है, जिसमें वैज्ञानिक की जिज्ञासा, कलाकार की संवेदना, इतिहासकार की दृष्टि, अर्थशास्त्री की समझ और समाजशास्त्री की चेतना का समावेश हो। उन्होंने आशा व्यक्त की कि महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थान इस दिशा में निरंतर गतिशील रहेंगे।
उपाधियां प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वे अपनी शिक्षा और ज्ञान के उद्देश्य पर विचार करें। उन्होंने कहा कि जब युवा अपने कार्यक्षेत्र में राष्ट्र और समाज के हित को सर्वोपरि रखेंगे, तभी उनकी व्यक्तिगत प्रगति के साथ-साथ देश का भी विकास होगा और उन्हें असीम संतोष मिलेगा।
राष्ट्रपति ने विभिन्न पेशों के माध्यम से समाज सेवा का आह्वान करते हुए कहा कि इंजीनियरों को ऐसी तकनीक विकसित करनी चाहिए जो जीवन को बेहतर बनाए, चिकित्सकों को चिकित्सा को पेशा नहीं बल्कि सेवा मानना चाहिए, और वैज्ञानिकों को मानवता के हित में समाधान खोजने चाहिए। उन्होंने उद्यमियों से केवल धन कमाने के बजाय रोजगार और अवसरों के सृजन का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने शिक्षकों से विरासत और विकास को साथ लेकर चलने वाली युवा पीढ़ी तैयार करने और सार्वजनिक जीवन में जाने वालों से पद को अधिकार के बजाय उत्तरदायित्व समझने की बात कही।
अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के राष्ट्रीय लक्ष्य का उल्लेख किया। उन्होंने एक ऐसे भारत की परिकल्पना साझा की जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, अवसरों की समानता और विज्ञान-प्रौद्योगिकी का उपयोग मानव कल्याण के लिए हो। उन्होंने कहा कि महिलाओं और युवाओं की पूरी क्षमता का उपयोग कर प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन देने के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में विश्वविद्यालयों और युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।


