स्वच्छ भारत मिशन 2.0: पुराने डंपसाइट्स अब बन रहे हैं इको पार्क और उत्पादक भूमि
भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत देशभर के पुराने कचरा डंपसाइट्स को वैज्ञानिक तरीके से उपचारित कर उत्पादक और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ स्थानों में बदला जा रहा है।

भारत में शहरी कचरा प्रबंधन के दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आया है। अक्टूबर 2014 में शुरू हुए स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (एसबीएम-यू) ने अब बुनियादी स्वच्छता से आगे बढ़कर शहरी कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन और भूमि की पुनः प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित किया है। अक्टूबर 2021 में शुरू हुए स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के अंतर्गत पुराने डंपसाइटों को उत्पादक स्थानों में बदला जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी और दिसंबर 2025 के बीच 3.66 करोड़ मीट्रिक टन पुराने कचरे का उपचार किया गया, जिसमें 29 राज्यों के 459 शहरी स्थानीय निकायों ने डंपसाइट्स का पूर्ण उपचार हासिल किया है।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 40 एकड़ का एक क्षेत्र, जो कभी नगरपालिका कचरे का विशाल टीला था, बायोमाइनिंग के माध्यम से साफ किया गया। यहाँ प्रतिदिन लगभग 400 टन कचरे को संसाधित कर उसे कचरा-व्युत्पन्न ईंधन, काली मिट्टी और रिसाइकल योग्य सामग्री में अलग किया गया। इस भूमि को अब 'कंचन राप्ती इको पार्क' के रूप में विकसित किया गया है, जिसमें हरे लॉन, जॉगिंग ट्रैक, ओपन जिम, योग क्षेत्र और बच्चों के खेलने का क्षेत्र शामिल है। यहाँ महिलाओं के नेतृत्व वाला स्वयं सहायता समूह 'शक्ति की रसोई' एक रेस्तरां का संचालन कर रहा है और पार्क प्रतिदिन लगभग 500 आगंतुकों को आकर्षित करता है।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के भलस्वा डंपसाइट में भी मिशन मोड में बायोमाइनिंग की जा रही है। जुलाई 2022 से शुरू हुए इस कार्य को नवंबर 2025 में शुरू हुए 'डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम' (डीआरएपी) के माध्यम से और गति दी गई। इसके परिणामस्वरूप, 31 जुलाई 2026 तक 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे का उपचार किया गया और मई 2026 तक आधे से अधिक साइट की पुनः प्राप्ति कर ली गई।
महाराष्ट्र के नागपुर में भांडेवाड़ी डंपिंग यार्ड को एक एकीकृत नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई में बदल दिया गया है। यहाँ 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक संचित कचरे का उपचार कर उसे खाद और अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन में बदला गया। इस पहल से लैंडफिल पर निर्भरता कम हुई है और आसपास के क्षेत्रों में हवा, पानी व मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
कर्नाटक के रायचूर में 35 एकड़ के याकलपुरा डंपसाइट का उपचार किया जा रहा है, जिससे अब तक 22 एकड़ भूमि पुनः प्राप्त हो चुकी है। यहाँ 5 से 7 एकड़ में मियावाकी जंगल विकसित किया गया है, जिसमें जैव विविधता बढ़ाने के लिए लगभग 60,000 बांस और देशी पौधे लगाए जा रहे हैं। इस वृक्षारोपण की शुरुआत 5 जून 2026 को विश्व पर्यावरण दिवस पर की गई थी।
आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के अनुसार, यह अभियान केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि बंजर कचरे के पहाड़ों को पुन: प्रयोज्य भूमि में बदलकर पारिस्थितिकी को बहाल करने और सतत शहरी विकास को बढ़ावा देने का एक प्रयास है।



